नोव्हेंबर २०१६

पहाट

    पहाट
  पहाट झाली, आकाश फाकल, लपली चांदणी
  रांगोळी- सडा घाली हसरी उषाराणी 
  जलकण शिंपणाचे पर्णकुशित मोत्यावाणी
  पेला रसगंधाचा घे, वदे सज्ज फुलराणी
  विहग पंख पसरती विहरण्या मुक्तांगणी 
  निघाली गोधने रानी, ललना रत जालभरणी
  ताज्या पवनलहरींवर हिंदोळती सुरेल गाणी 
  वाट चाले आता नवी सकाळ 
      होई सुख-दुखाची हातमिळवणी 
  ढगकाळे- पांढरे देती
             एकमेका हुलकावणी
  दिनक्रम रोजचा वाटावा नवा 
         पण मुरलेल्या गुलकंदावणी 
  वसंत- शिशीरात डोले डहाळी
           गात आरती वा विराणी 
  सदा बहार राहे हिरवा सर्वकाळी 
           सदाबहार आणी जीवनीं
              विजया केळकर _____

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